कबीर ने हेडफ़ोन नहीं उतारे। माइक म्यूट नहीं किया। बस एक हाथ उठाया—हथेली बाहर—जैसे ट्रैफ़िक पुलिस किसी झंझट को रोकती है।
अभी नहीं।
पिता ठिठक गए। मुस्कान भ्रम में घुल गई। उन्होंने फल की तरफ़, फिर कबीर की तरफ़ इशारा किया—होंठ हिलाए, पर नॉइज़-कैंसलिंग ने शब्द मिटा दिए: बेटा, खा लो। पेट के लिए अच्छा है।
कबीर ने घूरा। उसने हेडसेट पर उंगली से थपकी दी, फिर स्क्रीन की तरफ़ इशारा किया जहाँ मार्क “क्यू3 प्रोजेक्शन्स” बोल रहा था।
बाहर जाओ।
वह इशारा वैसा ही था जैसा वह सड़क के कुत्ते को भगाने में करता।
पिता एक सेकंड रुके… फिर दूसरा… कबीर को देखा—सच में देखा—मोतीए से धुंधली आँखों में, और बरसों के अनकहे स्नेह में भीगी नजर। उन्होंने उस बेटे को देखा जो दुनिया के लिए “ह्यूमन कनेक्शन” ऑप्टिमाइज़ करने की बात करता था, पर कमरे में मौजूद इंसान के लिए तीस सेकंड नहीं निकाल सकता था।
फिर उन्होंने छोटा-सा, झटकेदार नोड किया। प्लेट को साइड टेबल पर बिना आवाज़ किए रखा और धीमे-धीमे घिसटते हुए बाहर चले गए।
दरवाज़ा ‘क्लिक’ करके बंद हो गया।
कबीर फिर स्क्रीन की ओर मुड़ा। चेहरा तुरंत “डायनामिक चार्म” में ढल गया।
“सॉरी,” वह स्मूदली बोला। “डोमेस्टिक हेल्प।”
मार्क हँसा। “नो वरीज़। अब बर्न रेट की बात करें…”