कॉल जीत की तरह खत्म हुआ। कबीर ने लैपटॉप बंद किया—अंतिमता की ‘स्नैप’ के साथ। उसे डील-क्लोज़िंग वाली डोपामिन-हाई मिली—तेज़, सिंथेटिक; जो असली खुशी की जगह कब की ले चुकी थी।
उसकी नजर पपीते पर गई। उसने काँटा उठाया और स्क्रीन स्क्रॉल करते हुए यांत्रिक ढंग से खाने लगा। स्वाद महसूस नहीं हुआ। उसे वे हाथ याद नहीं आए जिन्होंने छीलकर काटा, वह चाकू, वह आदमी जो बाज़ार तक गया क्योंकि कबीर ने अपच की शिकायत की थी।
11:30 PM। हो गया।
वह पानी लेने हॉल में निकला। फ्लैट अँधेरा था। पिता का दरवाज़ा बंद। न खाँसी, न पुराने रेडियो की धीमी आवाज़।
अच्छा, कबीर ने सोचा। सो गए होंगे।
एक पतला-सा अपराधबोध चमका—न्यूरोटिक, संभालने योग्य। मैं उनके लिए ही तो कर रहा हूँ, उसने खुद को समझाया। यह राउंड क्लोज़ होते ही नर्स रख दूँगा। देहरादून वाला घर… खरीद दूँगा। अगले साल समय होगा। अगले साल उनके साथ बैठकर फल खाऊँगा।
उसे नहीं पता था कि “अगला साल” किसी नक्शे पर नहीं होता।
वह वापस कमरे में गया, हेडफ़ोन पहने और व्हाइट-नॉइज़ चला दिया—ख़ामोशी को दबाने के लिए।
अगले कमरे में ख़ामोशी पूर्ण थी।
अनकहे प्रेम की पोस्टमार्टम रिपोर्ट
एक क्लिनिकल रिपोर्ट: हम देर होने तक क्यों टालते रहते हैं
भाग 1: जीवित भूत
अध्याय 1: नॉइज़-कैंसलिंग हेडफ़ोन
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समाप्ति (वैकल्पिक)
आप चाहें तो इस अध्याय को “Completed” मार्क कर सकते हैं। यह वैकल्पिक है।
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