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THE AUTOPSY OF UNSPENT LOVE
PART III: THE ANATOMY OF "TOO LATE"
Chapter 11: The Unread Message
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यह दिल का “कमोडिटी फ़ेटिशिज़्म” था। आरव ने रिया को एक इंसान नहीं, एक प्रोडक्ट की तरह ट्रीट किया— जैसे अमेज़न पर कोई चीज़: देखो, तौलो, पसंद आए तो कार्ट में डालो, न आए तो डिस्कार्ड कर दो— अपने तत्काल आराम के हिसाब से। उसने मान लिया था कि रिया हमेशा वहीं रहेगी— “Save for Later” की लिस्ट में, उस दिन के लिए जब वह तैयार होगा उसकी संगत को “कंज़्यूम” करने के लिए। उसे यह समझ नहीं आया था कि लोग प्रोडक्ट नहीं होते। प्रोडक्ट का इन्वेंटरी होता है। इंसान की मृत्यु होती है। “वो… एक इंसान थी,” आरव ने फुसफुसाया। क्लिनिक की निर्जीव, सैनिटाइज़्ड चुप्पी में उसकी आवाज़ टूटने लगी। “वो पूरी की पूरी… एक इंसान थी।” उसने सिर उठाया। कबीर सामने बैठा था, फर्श को घूर रहा था। आरव के भीतर अचानक एक बेचैन, तड़पती ज़रूरत उठी— कन्फ़ेस करने की, उगल देने की, पेट में जमा ज़हर को बाहर निकाल देने की। “मैंने उसे घोस्ट किया था,” आरव ने कहा। कबीर ने ऊपर देखा। उसकी आँखें खोखली थीं। “किसे?” “ये लड़की,” आरव ने फोन की स्क्रीन कबीर की तरफ घुमा दी। “रिया। वो मर गई। शायद एक्सिडेंट… मुझे लगता है। हम डेट पर गए थे। वो अपनी दादी के बारे में दुखी थी। मुझे… बोरिंग लगा। मैंने नकली इमरजेंसी बनाई और निकल गया। फिर उसने मैसेज किया कि मेरे सनग्लासेज़ टेबल पर रह गए थे। मैंने रिप्लाई नहीं किया।” आरव काँप रहा था। “मुझे लगा मेरे पास अनगिनत ऑप्शन हैं। मुझे लगा… ‘उसकी उदासी क्यों झेलूँ, जब मुझे कोई हमेशा खुश रहने वाली मिल सकती है?’ और अब… इन कमेन्ट्स को पढ़कर… वो कितनी अद्भुत थी। वो… वही थी, जो मैं सच में चाहता था। लेकिन मैं इतना ‘शॉपिंग’ में व्यस्त था कि मेरे सामने जो असली चीज़ थी, उसकी कीमत ही नहीं देख पाया।” क्लिनिक की हवा में एक अलग तरह का सन्नाटा घुल गया— ऐसा सन्नाटा, जो किसी बीमारी का नहीं, किसी जाग जाने का लक्षण होता है।
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