कबीर ने धीरे-धीरे सिर हिलाया।
वह सिर हिलाना हल्का नहीं था।
उसमें पहचान का वजन था—और अपराधबोध की भारी कशिश।
“यह वही बीमारी है, आरव,” कबीर ने धीमे से कहा।
“तुम अपनी डेट के साथ।
मैं अपने पिता के साथ।
हम लोगों को ‘कंटेंट’ समझने लगे हैं।
हमें लगता है—अगर वे हमें एंटरटेन नहीं कर रहे,
तो हम उन्हें स्क्रॉल करके आगे निकल सकते हैं।
हम उनके ‘परफेक्ट’ वर्ज़न का इंतज़ार करते रहते हैं—
जो कभी थकता नहीं,
कभी दुखी नहीं होता,
कभी हमारी सुविधा से बाहर नहीं जाता।”
कबीर थोड़ा आगे झुका।
उसकी आवाज़ और भी शांत हो गई—पर बात धारदार।
“लेकिन मौत…
मौत ही एक चीज़ है जो सच में परफेक्ट है।
वह परफेक्टली अंतिम है।
और वह तुम्हें छोड़ जाती है—
उन सब बातों की इन्वेंटरी के साथ,
जो तुमने कभी कही ही नहीं।”
आरव ने फिर फोन देखा।
उसे रिया से कहना था कि उसका दुख भी सुंदर था।
उसे कहना था कि वह व्यस्त नहीं था—
वह डर गया था।
उसे कहना था—सनग्लासेज़ के लिए धन्यवाद।
“अलस…” आरव ने सोचा।
यह शब्द उसके भीतर गूंजा—
प्राचीन,
और भयानक।
और तभी उसे समझ आया—
आधुनिक डेटिंग एक म्यूज़िकल चेयर्स का खेल बन गई है,
टाइटैनिक की डेक पर खेला जा रहा खेल।
सब भाग रहे हैं।
ऑप्टिमाइज़ कर रहे हैं।
अपग्रेड ढूँढ रहे हैं।
“बेटर सीट” की तलाश में।
और वे संगीत को नहीं सुन रहे।
लोगों को नहीं देख रहे।
फिर एक दिन संगीत रुक जाता है।
और जब वह रुकता है,
तुम्हें “बेहतर सीट” नहीं मिलती।
तुम बर्फीले पानी में अकेले रह जाते हो।
आरव ने फोन नीचे रख दिया।
अब उसे स्क्रीन नहीं देखनी थी।
उसे किसी चेहरे को देखना था।
किसी भी चेहरे को।
उसने रिसेप्शनिस्ट की तरफ देखा।
उसके चेहरे पर थकान थी।
उंगली पर पट्टी बंधी थी—
जैसे किसी छोटे-से घाव ने भी उसे याद दिला दिया हो:
यहाँ सब असली हैं।
सब नाज़ुक हैं।
सब एक-एक दिन पर टिके हैं।