नोएडा में बारिश हो रही थी। वह धूसर, लगातार पड़ती बारिश—जो कांच की इमारतों से धूल तो धो देती है, लेकिन ट्रैफिक को हॉर्न बजाते लोहे की कीचड़ में बदल देती है।
डॉ. फ़राह के केबिन के भीतर हवा स्थिर थी।
कबीर, मीरा और आरव एक अर्ध-वृत्त में बैठे थे। वे “मरीज़ वाली कुर्सियों” पर नहीं बैठे थे; उन्होंने कुर्सियाँ खींचकर पास कर ली थीं—मानवता का एक छोटा, टेढ़ा-मेढ़ा द्वीप बना कर। आज वे दवाइयों के लिए नहीं आए थे। वे इसलिए आए थे क्योंकि उन्हें समझ आ गया था कि उनकी बीमारी शरीर में नहीं थी।
“Science उपयोगी है,” डॉ. फ़राह ने कहा, अपनी कुर्सी पर पीछे टिकते हुए। उन्होंने डॉक्टर की कोट की जगह एक शॉल ओढ़ रखी थी। “Science बता सकती है कि आपका cortisol ऊँचा है। यह बता सकती है कि लगातार scrolling से आपके dopamine receptors थक गए हैं। यह बता सकती है कि grief MRI में brain damage जैसा दिख सकता है। लेकिन यहाँ Science बेबस है।”
उन्होंने तीनों को देखा।
“Science यह नहीं बता सकती कि एक फोन कॉल न उठाने के लिए आप खुद को कैसे माफ़ करें। Science उस चुप्पी का वज़न नहीं गिन सकती जो आपने किसी के लिए बनाई।”