“अब,” फ़राह फुसफुसाईं, “कल्पना करो कि तुम उनके अंतिम संस्कार में खड़े हो। तुम उनका चेहरा आखिरी बार देख रहे हो। तुम क्या दोगे? तुम कितना चुकाओगे—बस एक बार और उनकी शिकायत सुनने के लिए? तुम क्या दोगे उस गीले तौलिए को उठाने के लिए?”
“सब कुछ,” मीरा हाँफ पड़ी, आँखें खोलते ही उसका शरीर काँप रहा था। “मैं सब कुछ दे दूँगी।”
“यही,” फ़राह ने मीरा की छाती की तरफ इशारा किया, “उस व्यक्ति की कीमत है। तुम उसे देख नहीं पाती थीं क्योंकि तुम्हारा ego बीच में था। Ego हिसाब रख रहा था—‘उसने यह किया, तो मैं वह करूँगी।’ Death उस scorecard को जला देती है।”
उन्होंने समूह को देखा। “इसे कहते हैं—Funeral for the Living। इसके लिए तुम्हें उनके मरने का इंतज़ार नहीं करना। तुम इसे अभी महसूस कर सकते हो। और अगर तुम अभी महसूस करोगे, तो घर जाकर उन्हें फर्नीचर की तरह ट्रीट नहीं करोगे।”
कबीर चुपचाप रो रहा था। उसने यह visualization असल ज़िंदगी में जी लिया था। वह इस exercise का सबूत था कि यह कोई खेल नहीं।
“मैंने अपना मौका खो दिया,” कबीर की आवाज़ खोखली थी। “मैं घर जाकर उसे गले नहीं लगा सकता।”