मीरा के गले में गाँठ-सी बन गई। यह घबराहट medical नहीं थी। यह Attachment Anxiety थी—उस माँ का शारीरिक रूप, जिसे धीरे-धीरे उसके बच्चे की ज़िंदगी से मिटाया जा रहा था।
“मुझे माफ़ कर दो,” मीरा ने कहा।
“अरे नहीं-नहीं, किस बात की माफी? बूढ़ापे में होता है,” माँ ने तुरंत ढक दिया—जैसे अपने दर्द को भी polite बनाना ज़रूरी हो।
“मुझे माफ़ कर दो कि मैं कभी सुनती नहीं,” मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ स्थिर थी, लेकिन टेबल के नीचे उसके हाथ काँप रहे थे। “मैं तुम्हें एक project की तरह ट्रीट करती हूँ, माँ। मैं आती हूँ, supplies चेक करती हूँ, bills भरती हूँ, और चली जाती हूँ। मैं तुम्हें… जैसे employee…”
मिसेज़ तनेजा ने अपने हाथों की तरफ देखा। “तू व्यस्त रहती है। बड़ा officer है। मैं तो… बस… यहाँ हूँ।”
“तुम ‘बस’ नहीं हो,” मीरा ने लगभग गुस्से में कहा। “तुम ही तो वजह हो कि मैं यहाँ हूँ।”
वह उठी, रसोई में गई। स्टील की प्लेटें निकालीं। आधी पकी दाल और बाहर से लाया हुआ दही परोसा। दो प्लेटें टेबल पर रखीं।
“आज हम साथ खाएँगे,” मीरा ने ऐलान किया।