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THE AUTOPSY OF UNSPENT LOVE
PART IV: THE REHABILITATION
अध्याय 15: अभी का अनुष्ठान
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सुबह 5:30 बजे यमुना नदी “पवित्र” नहीं लग रही थी। वह थकी हुई लग रही थी—दिल्ली के स्मॉग को चीरती हुई एक धूसर, सुस्त-सी धार, जिसमें गेंदा, कीचड़ और औद्योगिक सड़न की मिली-जुली गंध थी। कबीर घाट पर खड़ा था, पैंट घुटनों तक चढ़ी हुई। ठंडा पानी टखनों से टकरा रहा था—और रीढ़ में एक कंपकंपी दौड़ रही थी, जो तापमान से कम और असहजता से ज़्यादा जुड़ी थी। उसे खुद पर हँसी आ रही थी। वह science का आदमी था। logic का आदमी। data analytics और scalability पर करियर बनाने वाला आदमी। और अब वह एक तांबे का लोटा पकड़े था—जिसमें पानी, काले तिल और कुशा घास थी—और वह तर्पण करने जा रहा था: पूर्वजों को “तृप्त” करने का प्राचीन अनुष्ठान। यह irrational है, उसके दिमाग ने तर्क दिया। पापा जा चुके हैं। उनका carbon cycle में लौट चुका है। यहाँ पानी डालने से afterlife में उनकी प्यास नहीं बुझेगी।
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