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THE AUTOPSY OF UNSPENT LOVE
PART IV: THE REHABILITATION
अध्याय 15: अभी का अनुष्ठान
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“Focus करो, जजमान,” पंडित ने तेज़ी से कहा। वह युवा था—मुश्किल से पच्चीस—धोती पहने हुए और हाथ में Nike smartwatch। “Analyze करना बंद। बस करो।” कबीर ने लंबी साँस ली। वह यह इसलिए कर रहा था क्योंकि शुक्ला मास्टर ने ज़िद की थी। “तुमने grief को intellectualize कर दिया है, कबीर,” बूढ़े आदमी ने कहा था। “लेकिन grief कोई equation नहीं। वह energy है। और energy को conduit चाहिए। Ritual बस वही conduit है।” “दक्षिण की तरफ मुँह करो,” पंडित ने निर्देश दिया। “वही पूर्वजों की दिशा है—पितृलोक।” कबीर मुड़ा। उसने उस धुंधले क्षितिज को देखा जहाँ स्मॉग नदी से मिल रहा था। “अब,” पंडित ने मंत्र पढ़ा, “ॐ पितृ देवता नमः… पानी धीरे डालो। उसे अंगूठे पर बहने दो। अपने पिता को visualize करो कि वे इसे ग्रहण कर रहे हैं।” कबीर ने लोटा झुकाया। ठंडा, साफ़ पानी टपका—अंगूठे पर बहा—और फिर वापस उसी मटमैली नदी में गिर गया। मैं क्या कर रहा हूँ? कबीर ने सोचा। मैं एक memory को पानी पिला रहा हूँ।
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