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THE AUTOPSY OF UNSPENT LOVE
PART IV: THE REHABILITATION
अध्याय 15: अभी का अनुष्ठान
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“अंगूठा ही क्यों?” कबीर ने पूछा—उसका skepticism बाहर निकल आया। पंडित ने मंत्र से नज़र नहीं उठाई। “अंगूठा अग्नि का प्रतीक है। लेकिन इस मुद्रा में यह पितरों से connection का प्रतीक बनता है। आप सिर्फ पानी नहीं डाल रहे, भाईसाहब। आप दे रहे हैं—ऋणमोचन—कर्ज़ से मुक्ति।” कर्ज़। यह शब्द कबीर के सीने में फँस गया। भारतीय दर्शन में हर बच्चा पितृ ऋण लेकर जन्मता है—उन पूर्वजों का ऋण जिन्होंने जीवन, जीवविज्ञान और वंश दिया। पर कबीर के लिए यह ऋण भारी था। यह सिर्फ biological नहीं था; यह emotional था। यह missed calls का ऋण था। कटे हुए फल का ऋण जो प्लेट में ही रह गया। और चुप्पी का ऋण। “वो प्यासा मर गया,” कबीर के मुँह से निकल गया। पंडित ने मंत्र रोक दिए। “क्या?” “जिस रात वो मरे,” कबीर ने फुसफुसाया, पानी को अपनी टाँगों के चारों तरफ घूमते देखते हुए। “वो मेरे लिए पपीता लाए थे। बात करना चाहते थे। मैंने उन्हें देखा तक नहीं। मैं… मैंने उन्हें attention से भूखा रखा। वो… spiritually thirsty मर गए।”
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