पंडित ने कबीर को देखा। उसके युवा चेहरे से boredom गायब हो गया। उसने घाव देख लिया।
“इसीलिए वो आपके मन में प्रेत है,” पंडित ने धीरे से कहा।
“भूत?”
“फिल्मों वाला भूत नहीं,” पंडित ने ठीक किया। “Psychology में प्रेत वह memory है जो आपको इसलिए haunt करती है क्योंकि वह भूखी है। वह असंतुष्ट है। वह कपड़े खींचती है। वह उस attention की मांग करती है जो आपने उसे ज़िंदा रहते नहीं दी। जब तक guilt है, आपके लिए आपके पिता प्रेत हैं—दर्द का स्रोत।”
कबीर ने सिर हिलाया। आँखों में आँसू चुभने लगे। यही तो सच था। पिता की याद comfort नहीं थी—वह haunting थी।
“Ritual,” पंडित ने आगे कहा, “प्रेत को पितृ बनाने के लिए है—Ancestor। Ancestor haunt नहीं करता। Ancestor protect करता है। Ancestor तृप्त होता है।”
“कैसे?” कबीर ने पूछा। “अब मैं उन्हें तृप्त कैसे करूँ? वो तो जा चुके हैं।”
“वहाँ नहीं,” पंडित ने आसमान की तरफ इशारा किया। “यहाँ।” फिर कबीर की छाती की तरफ। “अभी अपने प्रेम का पानी चढ़ाइए। कहिए—‘पापा, मैं देर से आया। पर मैं अभी यहाँ हूँ। यह attention पी लो। यह समय पी लो। मैं अभी तुम्हें दे रहा हूँ।’”
Ritual as Psychodrama. (अनुष्ठान एक मनो-नाटक की तरह।)