“यह तो बस costume है… है ना?”
कबीर ने मुड़कर देखा। शुक्ला मास्टर दरवाज़े पर खड़े थे—छड़ी का सहारा लेकर। वे कबीर को देखने आए थे, क्योंकि वे जानते थे: funeral के बाद के हफ्ते अक्सर funeral से भी ज़्यादा भारी होते हैं।
“आपका मतलब?” कबीर ने पूछा, शॉल नीचे रखकर।
“हम पूरी ज़िंदगी costume को iron करने में लगा देते हैं,” शुक्ला मास्टर ने कहा—धीरे-धीरे कमरे में आते हुए और बिस्तर के किनारे बैठते हुए। “हम उसे धोते हैं, रंगते हैं, दिखाते हैं। और दूसरों को उनके costume से judge करते हैं—‘अरे, उसका costume wrinkled है (old age)।’ ‘उसका costume बहुत loud है (personality)।’ ‘उसका costume बहुत expensive है (status)।’”
उन्होंने कपड़ों के ढेर की तरफ इशारा किया। “लेकिन जब नाटक खत्म होता है, actor घर चला जाता है। और हम यहाँ—costume पकड़कर—एक कपड़े के टुकड़े पर रोते रह जाते हैं।”