“यही तो त्रासदी है,” शुक्ला मास्टर ने सिर हिलाया। “गीता कहती है—‘Vasamsi jirnani yatha vihaya’—जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र उतारकर नए पहनता है, वैसे ही देहधारी आत्मा पुराने शरीर छोड़कर नए में प्रवेश करती है। हम इसे intellectually जानते हैं। लेकिन जीते नहीं।”
“क्यों?” कबीर ने पूछा। “हम उनके मरने तक क्यों इंतज़ार करते हैं यह समझने के लिए कि वे ‘Souls’ थे?”
“क्योंकि मृत्यु vehicle का illusion तोड़ देती है,” शुक्ला मास्टर बोले। “सोचो, तुम एक कार चला रहे हो। तुम bumper के dents, windshield की धूल, engine की आवाज़—इन सब में इतने उलझे हो कि कार पर चिल्लाने लगते हो। फिर अचानक Driver बाहर निकलकर चला जाता है। कार वहीं—silent—खड़ी रह जाती है। तब तुम्हें पता चलता है: point कार कभी थी ही नहीं। connection… वह Driver से था। लेकिन Driver जा चुका है।”
कबीर ने फिर ग्रे शॉल को देखा। “Car” हमेशा के लिए park हो चुकी थी। “Driver” चला गया था।