एल्गोरिदम उलझ गया था।
सालों से दिल्ली के युवाओं की सोशल मीडिया फीड तीन चीज़ों से भरी रहती थी:
1. Hustle Porn (सुबह 4 बजे पढ़ाई के time-lapse videos)।
2. Aesthetic Melancholy (ब्लैक-एंड-व्हाइट फोटो पर उदास quotes)।
3. Performative Luxury (क्लब टेबल्स, bottle service, किराए की गाड़ियाँ)।
पर अचानक metrics बदलने लगे। "Fake" की engagement घट रही थी। "Real" वायरल हो रहा था।
यह शुरुआत हुई St. Stephen’s College के एक वीडियो से। वह कोई dance reel नहीं था। वह एक shaky, low-quality वीडियो था—कुछ छात्र घास पर बैठे थे; फोन पर नहीं, बल्कि पुराने कबीर भजन गा रहे थे। वे polished नहीं थे। वे messy थे। वे... खुश लग रहे थे।
कैप्शन था: “No filter. No drugs. Just us. #Roots”
वीडियो explode हो गया। Millions of views। इसलिए नहीं कि वह flashy था, बल्कि इसलिए कि वह रेगिस्तान में पानी जैसा था। dopamine hits पर पली पीढ़ी oxytocin के लिए भूखी थी।