उस शाम समूह शुक्ला मास्टर के घर मिला। छोटा-सा, किताबों और अगरबत्ती की खुशबू वाला, थोड़ा-सा cluttered फ्लैट। वे फर्श पर बैठे—CEO (कबीर), Influencer (आरव), Superwoman (मीरा)।
"यह फैल रहा है," आरव ने फोन दिखाते हुए कहा। "लोग अपनी 'aesthetic' archives delete कर रहे हैं। वे दादी के झुर्रीदार हाथों की तस्वीरें पोस्ट कर रहे हैं। वे failures पोस्ट कर रहे हैं। वे सच पोस्ट कर रहे हैं।"
शुक्ला मास्टर ने सिर हिलाया। "झूठ sprint दौड़ सकता है," उन्होंने कहा। "पर सच marathon दौड़ता है। आप जड़ (root) को हमेशा दबा नहीं सकते। एक दिन concrete में दरार पड़ती ही है।"
उन्होंने उन्हें देखा।
"तुम्हें लगा तुम खुद को बदल रहे हो," वे बोले। "पर तुम बस आईना साफ कर रहे थे। 'modernity' की धूल—जल्दी, लालच, transactional love—वह सिर्फ धूल थी। नीचे की reflection हमेशा मौजूद थी। वह बस इंतजार कर रही थी।"