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अनखर्चे प्रेम का पोस्टमॉर्टम
आधुनिक टूटन और पुनर्प्राप्ति पर एक चिकित्सकीय रूपक
भाग IV: पुनर्वास
अध्याय 23: जड़ों की प्रार्थनाएँ
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English हिन्दी
मीरा की माँ, श्रीमती तनेजा, शॉल कसकर लपेटे बैठीं थीं। आज वे घुटनों की शिकायत नहीं कर रहीं थीं। वे मुस्कुरा रही थीं—एक छोटी-सी, खुद भी हैरान मुस्कान। “कल मीरा जल्दी घर आ गई,” उन्होंने धीमे से कहा। घेरा थोड़ा पास खिसक आया। “जल्दी? कहीं बीमार तो नहीं?” श्री गुप्ता ने पूछा, जिनका बेटा दो साल से मिलने नहीं आया था। “नहीं,” श्रीमती तनेजा ने सिर हिलाया। “वो खाना बनाने आई। इसलिए नहीं कि बाई नहीं थी। बोली—मैं खीर बनाना सीखना चाहती हूँ। मेरी माँ की रेसिपी।” समूह पर एक ख़ामोशी उतर आई। उनके बच्चों की आधुनिक भाषा में “कुकिंग” ऐप्स को आउटसोर्स करने वाली चीज़ थी। “टाइम” पैसा था। मीरा जैसी CEO का चूल्हे के पास खड़े होकर एक घंटे दूध चलाना—यह एक अपवाद था। यह एक चमत्कार था। “वो मेरे साथ बैठी,” श्रीमती तनेजा की आँखें नम हो गईं। “उसने फोन नहीं देखा। उसने मुझे देखा। उसने मेरे गठिया के बारे में पूछा। और जवाब सचमुच सुना। दस साल में पहली बार, मुझे बोझ नहीं लगा। मुझे लगा… मैं उसकी माँ हूँ।”
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