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अनखर्चे प्रेम का पोस्टमॉर्टम
आधुनिक टूटन और पुनर्प्राप्ति पर एक चिकित्सकीय रूपक
भाग IV: पुनर्वास
अध्याय 23: जड़ों की प्रार्थनाएँ
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श्री गुप्ता ने लंबी साँस छोड़ी और आसमान की ओर देखा। “कल रात मेरे बेटे का फोन आया,” उन्होंने कहा। “कोई व्हॉट्सऐप फॉरवर्ड नहीं। वीडियो कॉल। वो रो रहा था। बोला—‘पापा, गुरु पूर्णिमा पर आपको विश करना भूल गया।’ उसने मेरा आशीर्वाद माँगा। मुझे लगा नशे में होगा। पर नहीं। वो बस… जाग गया था।” ऐसा हर जगह हो रहा था। इन माता-पिताओं ने वर्षों से जो बेबसी एक भारी कोट की तरह पहन रखी थी, वह अब उतरने लगी थी। उन्होंने अपने बच्चों को पश्चिम की मृगतृष्णा के पीछे भागते देखा था—व्यक्तिवाद, “बाउंड्रीज़”, “स्पेस”। उन्होंने जवाब सुने थे—“आप टॉक्सिक हैं” या “आप मेंटल हेल्थ नहीं समझते।” वे चुप हो गए थे, कोनों में दीये जलाते थे, धन नहीं—अपने बच्चों की आत्मा की वापसी माँगते थे। और अब, जैसे… भगवान सुन रहे थे। शुक्ला मास्टर उस घेरे में आए। वे आश्चर्यचकित नहीं थे। “बुखार उतर रहा है,” उन्होंने चाय का घूँट लेते हुए कहा। “कौन सा बुखार?” श्रीमती तनेजा ने पूछा। “‘मैं’ का बुखार,” शुक्ला मास्टर बोले। “एक वायरस ने हमारे बच्चों को बताया कि वे हमसे अलग हैं, दुनिया से अलग हैं। उसने उन्हें बीमार किया—चिंता, अकेलापन, सुन्नपन। उन्होंने इसका इलाज पैसा, पार्टियाँ, गोलियाँ समझा। पर शाखा की बीमारी का इलाज सिर्फ जड़ से फिर जुड़ना है।”
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