उन्होंने उन बुज़ुर्ग चेहरों को देखा, जिन पर त्याग की रेखाएँ किसी नक्शे की तरह बनी थीं।
“आपने उन्हें छोड़ा नहीं,” शुक्ला मास्टर बोले। “आपने जड़ों को जीवित रखा, जबकि वे प्लास्टिक के फूल बनने की कोशिश कर रहे थे। अब जब प्लास्टिक फीका पड़ा है, वे मिट्टी की ओर लौट रहे हैं।”
यह सिर्फ कुछ परिवारों की बात नहीं थी। यह सामाजिक परिवर्तन था।
बाज़ारों में युवा लड़के माँओं के थैले उठाते दिखने लगे—किसी मजबूरी से नहीं, गर्व से।
मंदिरों में मंगलवार को हनुमान चालीसा की लाइन में जींस पहने किशोर भी थे—वे उस ताकत को खोज रहे थे जो इंस्टाग्राम नहीं दे सकता।
“हसल” की जगह “सेवा” का विचार लौट रहा था।
श्रीमती तनेजा ने अपने इष्ट की लॉकेट को छुआ। “मुझे लगा मैंने उसे खो दिया,” उन्होंने फुसफुसाकर कहा। “मुझे लगा मॉडर्निटी मेरी बेटी को खा गई। पर वो वहीं थी। बस… सो गई थी।”
सूरज धुँधले शहर के ऊपर उगा और पार्क पर सुनहरी रोशनी पड़ गई।
माता-पिता चुपचाप चाय पीते रहे। उन्हें बोलने की ज़रूरत नहीं थी। राहत सामूहिक थी—एक पीढ़ी की वह साँस, जिसे अब समझ आया कि उसका त्याग व्यर्थ नहीं गया। पेड़ फिर धरती की ओर झुक रहे थे।
मुख्य अवधारणाएँ:
1. “आधुनिक” बुखार का उतरना।
2. परंपरा का प्रत्याभिज्ञान।
3. मौन प्रार्थना की शक्ति।
4. पीढ़ियों के बीच उपचार।
अनखर्चे प्रेम का पोस्टमॉर्टम
आधुनिक टूटन और पुनर्प्राप्ति पर एक चिकित्सकीय रूपक
भाग IV: पुनर्वास
अध्याय 23: जड़ों की प्रार्थनाएँ
पेज 4 / 4
समाप्ति (वैकल्पिक)
आप चाहें तो इस अध्याय को “Completed” मार्क कर सकते हैं। यह वैकल्पिक है।
Machine-ID: 4e0219f925dd6ff4f3c004070b77918e