दृश्य 4: वयस्कों को बुलावा
मिशन का अगला हिस्सा असहज था: फील्ड-वर्क।
वे उन जगहों पर गए जहाँ “values” अक्सर सज़ा की भाषा में पढ़ाए जाते हैं—जीवित अभ्यास की भाषा में नहीं।
स्कूल।
वे उन प्रिंसिपल्स के साथ बैठे जो “इस जनरेशन” की शिकायत करते थे।
शuk्ला मास्टर ने पूछा:
“आपके शिक्षकों ने बिना फ़ोन देखे आखिरी बार बच्चों के साथ कब लंच किया? आपने बिना बच्चों को सार्वजनिक रैंकिंग में चढ़ाए सहयोग कब सिखाया?”
उन्होंने छात्रों को दोष नहीं दिया। उन्होंने सिस्टम का ऑडिट किया।
कोचिंग संस्थान।
डॉ. फ़राह ने एंग्ज़ायटी से भरे किशोरों और उनके माता-पिता से भरे हॉल को संबोधित किया।
उन्होंने “कम पढ़ो” नहीं कहा।
उन्होंने कहा: “अगर आपकी महत्वाकांक्षा की कीमत आपकी दादी है—तो वह कीमत बहुत ज़्यादा है।”
फिर माता-पिता की ओर मुड़कर बोलीं:
“अपने बच्चे को अपना redemption project मत बनाइए।”
कुछ माता-पिता नाराज़ हुए। बहुतों को राहत मिली।
सोसाइटी/RWA।
मीरा ने छोटे-छोटे “Breakfast वाली यूलॉजी” सर्कल्स चलाए। थेरेपी नहीं—अभ्यास।
उन्होंने आंटियों-अंकलों से जीवित लोगों के लिए appreciation cards लिखवाए और ज़ोर से पढ़वाए।
वे पुरुष, जो रोना नहीं जानते थे, अपनी पत्नियों को एक पंक्ति पढ़कर रो पड़े:
“मैंने कभी बताया ही नहीं कि मैं नोटिस करता/करती हूँ।”
MNC के HR प्रमुख।
कबीर ने “work-life balance” नाम की मूर्ति पर चोट की।
उसने उसे झूठ कहा:
“बैलेंस नाम की चीज़ नहीं। केवल प्राथमिकता होती है। और आपकी नीतियाँ बताती हैं कि आप किसकी पूजा करते हैं।”
उसने प्रस्ताव रखे:
• 6 PM के बाद मीटिंग नहीं
• महीने में एक बार अनिवार्य “Home Day” (caregiving के लिए)
• प्रमोशन में “Collaboration scoring” एक फैक्टर
• मैनेजर्स का मूल्यांकन retention और human outcomes पर, सिर्फ targets पर नहीं
एक HR head ने पूछा: “क्या इससे हम प्रतिस्पर्धी नहीं रहेंगे?”
कबीर ने कहा: “हो सकता है। लेकिन आप इंसान हासिल करेंगे।”