उसे नहीं पता था कि तीन महीने बाद वह उसी फूलों वाले सोफे पर बैठेगी—सफेद कपड़ों में रिश्तेदारों के बीच—और ठंडा पड़ा गाजर का हलवा हाथ में होगा, जिसे वह फेंक भी नहीं पाएगी।
उसे नहीं पता था कि वह खाली फ्लैट में चिल्लाएगी: “मुझे मिसेज़ गुप्ता के बारे में बताओ! नदी के बारे में बताओ! मैं सुनूँगी! मैं वादा करती हूँ, मैं सुनूँगी!”
पर आज, लिफ्ट के दरवाज़े बंद हो गए। ट्रांज़ैक्शन पूरा हुआ। रसीद प्रिंट हो गई।
और मीरा ने दिमाग़ की चेकलिस्ट में “माँ से मिलना” टिक कर दिया—यह जाने बिना कि वह असल ‘मीटिंग’ मिस कर चुकी है।
कुछ मीटिंग्स री-शेड्यूल नहीं होतीं।
क्योंकि समय कम है—इसलिए नहीं।
क्योंकि इंसान… कम हो जाता है।
और सबसे क्रूर हिस्सा यह है:
हम उन्हें एक दिन में नहीं खोते।
हम उन्हें छोटे-छोटे, कुशल ‘एग्ज़िट’ में खोते हैं।
परफेक्टली ऑप्टिमाइज़्ड गुडबाय में।
अनकहे प्रेम की पोस्टमार्टम रिपोर्ट
एक क्लिनिकल रिपोर्ट: हम देर होने तक क्यों टालते रहते हैं
भाग 1: जीवित भूत
अध्याय 3: स्नेह की शर्तें
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समाप्ति (वैकल्पिक)
आप चाहें तो इस अध्याय को “Completed” मार्क कर सकते हैं। यह वैकल्पिक है।
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