एक कोने में प्लास्टिक की कुर्सी पर धँसा हुआ आरव बैठा था।
उसने फोन को लाइफलाइन की तरह पकड़ रखा था। वह doomscrolling कर रहा था।
असम में बाढ़। यूरोप में युद्ध। नए वायरस का स्ट्रेन। कोई इंफ्लुएंसर नस्लवाद पर माफ़ी माँग रहा है।
Swipe. Swipe. Swipe.
वह खबरें पढ़ नहीं रहा था। वह खुद को सुन्न कर रहा था।
कई महीनों से उसे हल्की-सी लगातार मिचली रहती थी—“gut issues” जिन्हें तीन गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट भी स्पष्ट नहीं कर पाए। उन्होंने कहा: IBS—इरिटेबल बाउल सिंड्रोम।
पर पेट झूठ नहीं बोलता।
वह उस जीवन पर रिएक्ट कर रहा था जो पूरी तरह सतह पर जिया जा रहा था। Decision fatigue। Dopamine की भूख। और लोगों को “प्रोडक्ट” बनाने की खोखली आदत।
उसने डेटिंग ऐप्स पर इतने चेहरे स्वाइप कर दिए थे कि अब वह किसी इंसान को पहचानना ही भूल गया था।
तीन लोग। तीन “सक्सेसफुल” ज़िंदगियाँ।
तीन अलग लक्षण।
एक साझा रोग: Thou से कटाव।
कंसल्ट रूम का दरवाज़ा खुला।
डॉ. फ़राह नक़वी बाहर आईं।