“डॉ. नक़वी,” कबीर ने गंभीर स्वर में कहा। “क्या आर्टरीज़ में प्रॉब्लम है?”
फ़राह ने उसे देखा। कोर्टिसोल से फूला चेहरा। आँखों में डर—मौत का नहीं, महत्वहीन हो जाने का।
“आपका दिल ठीक है, कबीर,” उन्होंने नरमी से कहा। “कम से कम शारीरिक रूप से।”
“पर दर्द तो है,” कबीर ने ज़िद की, उरोस्थि (sternum) छूते हुए। “ऐसा लगता है जैसे कुछ सीने पर बैठा है।”
“शायद कुछ बैठा है,” फ़राह बोलीं। “या शायद कोई—जिससे आपने बात नहीं की।”
कबीर भौंहें सिकोड़ गया। “मुझे समझ नहीं आया। मुझे beta-blocker चाहिए।”
“मैं गोलियाँ दे सकती हूँ,” फ़राह ने दरवाज़ा खोलते हुए कहा। “पर वे आपके घर की खामोशी ठीक नहीं करेंगी।”
एक पल को कबीर का अंदरूनी noise-cancelling टूट गया।
पपीते की स्टील प्लेट।
घिसटती चप्पलें।
दरवाज़े की ‘क्लिक’।
उसने तुरंत विचार झटक दिया। यह क्वैक है। मैं अगले हफ्ते Max चला जाऊँगा।
“बस पर्चा लिख दीजिए, डॉक्टर,” उसने ठंडे स्वर में कहा।