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अनकहे प्रेम का पोस्टमार्टम
एक क्लिनिकल रिपोर्ट: हम देर होने तक क्यों टालते रहते हैं
भाग 2: अचानक खामोशी
अध्याय 5: अनुत्तरित कॉल
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फोन फिर बजा। Caller ID: Dad. इस बार वाइब्रेशन ज़्यादा तेज़ लगा। कबीर की पीठ पर पसीने की एक बूंद सरक गई। “दो बार क्यों?” उसने सोचा। “उन्हें पता है आज बड़ा मीटिंग है।” Normalcy bias चालू हो गया: पापा ठीक हैं। सुबह तो ठीक थे। बस बूढ़े हैं, भूलते हैं। अगर मैंने उठाया तो कमरे की लय टूटेगी। बीस मिनट में कॉल-बैक कर दूँगा। Decline. उसने फोन उल्टा रख दिया। “सॉरी,” कबीर मुस्कुराया—कसी हुई, आकर्षक मुस्कान। “Persistence is a virtue, usually.” इन्वेस्टर्स हँस पड़े। उन्हें यह पसंद आया। फोकस। प्रायोरिटी। मिशन बनाम डिस्ट्रैक्शन। कबीर पिच में और गहरा उतर गया—हर लाइन चमकदार। “हम सिर्फ़ ऐप नहीं बना रहे, हम एक ecosystem बना रहे हैं।” वह उनके चेहरों पर सूक्ष्म संकेत पढ़ रहा था। वह जीत रहा था। जब पिच पूरी हुई, लीड इन्वेस्टर—मिस्टर गोयल, जिनकी दौलत माइनिंग से बनी थी—खड़े हुए और हाथ मिलाया। “इम्प्रेसिव नंबर, बेटा। लगता है डील हो गई।” कबीर के दिमाग़ में डोपामिन का विस्फोट हुआ। स्टेटस। वैलिडेशन। गेम ने उसे इनाम दिया। “कल,” उसने खुद से कहा, “मैं परफेक्ट बेटा बनूँगा।” ‘कल’—वह शब्द जो प्रेम को टालने वालों को आराम देता है।
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