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अनकहे प्रेम का पोस्टमार्टम
एक क्लिनिकल रिपोर्ट: हम देर होने तक क्यों टालते रहते हैं
भाग 2: अचानक खामोशी
अध्याय 5: अनुत्तरित कॉल
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उसके बाद की खामोशी खाली नहीं थी। वह भारी थी—जैसे सच अपनी जगह बदल रहा हो। “वो…?” कबीर शब्द नहीं कह पाया। “एम्बुलेंस अभी निकली है, साहब,” इमरान की आवाज़ टूट रही थी। “आपको Max Hospital आना होगा। सीधे… mortuary entrance पर।” कबीर ने फोन नीचे कर लिया। बोर्डरूम के बाहर कॉरिडोर में हलचल थी। लोग मीटिंग्स को दौड़ रहे थे, ईमेल देख रहे थे, हँस रहे थे, workflow optimize कर रहे थे। दुनिया ‘Doing’ के शोर से भरी थी। पर कबीर एक वैक्यूम में खड़ा था। उसने हाथ में पकड़े डिवाइस को देखा—जिससे वह स्टेप्स, हार्ट रेट, नेट वर्थ ट्रैक करता था। वही डिवाइस—जिसे उसने उस आवाज़ पर प्राथमिकता दी जिसने उसे बोलना सिखाया था। पहला वाइब्रेशन याद आया। मैं उठा सकता था। दूसरा वाइब्रेशन याद आया। मैं उसकी आवाज़ सुन सकता था। मितली उठी—घुटनों तक गिरा देने वाली। उसने पिता के जीवन का आख़िरी पल—स्क्रीन पर बने ग्राफ़ के बदले दे दिया था। उसने Thou को Decline किया था—It के लिए। और अब फोन शांत था। शांत—जैसे अंतिम संस्कार के बाद का कमरा। शांत—जैसे प्रेम को बहुत देर तक टाल देने के बाद की ज़िंदगी।
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