कबीर चमकदार कॉरपोरेट फ़र्श पर बैठ गया। महँगा सूट सिकुड़कर उसके चारों तरफ इकट्ठा हो गया।
वह रोया नहीं।
वह बस कॉल-लॉग घूरता रहा।
Dad (Missed).
Dad (Missed).
Dad (Missed).
Dad (Missed).
फिर वह डरावनी सच्चाई—सर्जिकल स्पष्टता के साथ—उतरी:
आप डेडलाइन मिस कर सकते हैं और री-शेड्यूल कर सकते हैं।
आप फ्लाइट मिस कर सकते हैं और रीबुक कर सकते हैं।
पर आप मृत व्यक्ति को मिस्ड कॉल वापस नहीं कर सकते।
“Busy” ट्रैप—आधुनिक भ्रम—एक सेकंड में ढह गया।
काम ‘urgent’ लगता था।
परिवार ‘postponable’ लगता था।
मौत ने यह क्रम उलट दिया।
कबीर के दिमाग़ में उसके अपने बहाने कोर्ट-ट्रांस्क्रिप्ट की तरह चलने लगे:
बीस मिनट में कॉल करूँगा।
लय नहीं टूटने दूँगा।
यह मीटिंग भविष्य तय करती है।
और अब भविष्य आ चुका था—पिता के बिना।
फोन की खामोशी—अब उसकी ज़िंदगी की खामोशी थी।
डबल-ग्लेज़्ड खिड़कियों वाली महँगी खामोशी नहीं।
एक अलग खामोशी।
जिसे कोई फंडिंग इन्सुलेट नहीं कर सकती।
जो हमेशा बजेगी—पर कभी वाइब्रेट नहीं करेगी।
अनकहे प्रेम का पोस्टमार्टम
एक क्लिनिकल रिपोर्ट: हम देर होने तक क्यों टालते रहते हैं
भाग 2: अचानक खामोशी
अध्याय 5: अनुत्तरित कॉल
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समाप्ति (वैकल्पिक)
आप चाहें तो इस अध्याय को “Completed” मार्क कर सकते हैं। यह वैकल्पिक है।
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