अपार्टमेंट बिल्कुल वैसा ही था। यही सबसे बड़ा अपमान था।
कबीर काँपते हाथों से दरवाज़ा खोल रहा था। उसे लगा था भौतिकी बदल गई होगी—दीवारें दरकी होंगी, खिड़कियाँ टूट गई होंगी, दुनिया टूटती हुई दिखेगी।
तीन घंटे पहले उसके पिता—उसका अपना आदमी—Max Hospital के ठंडे triage room में अस्तित्व से बाहर हो गए थे। दुनिया को बदल जाना चाहिए था।
पर Wi-Fi राउटर लगातार हरी लाइट झपका रहा था। एयर प्यूरिफ़ायर अपनी महँगी-सी नरम धुन में गुनगुना रहा था। रोबोटिक वैक्यूम कोने में डॉक पर, कमांड का इंतज़ार कर रहा था।
घर पूरी तरह “फंक्शन” कर रहा था।
वह उदासीन था।
कबीर जूते उतारे बिना अंदर चला आया। यह छोटा-सा उल्लंघन—जैसे चीख हो।
“पापा?”
शब्द प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स के रोकने से पहले ही निकल गया।
न्यूरोसाइंस कहता है—दिमाग़ सिर्फ़ रिएक्ट नहीं करता; वह भविष्यवाणी करता है। 32 सालों में कबीर के दिमाग़ ने वास्तविकता का एक हाई-फिडेलिटी नक्शा बनाया था, और उसके पिता उस नक्शे की “लोड-बेयरिंग” दीवार थे।
दिमाग़ को हॉलवे में Vicks की गंध की उम्मीद थी।
वॉल्यूम 12 पर हिंदी न्यूज़ की।
रबर चप्पलों की घिसट की।
जब इंद्रियों ने “Null” लौटाया, तो दिमाग़ ने उसे “मौत” नहीं माना।
उसने उसे “ग्लिच” माना।
फिर न्यूरॉन बोले—दोबारा कोशिश करो।
और ध्यान से सुनो।