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अनकहे प्रेम का पोस्टमार्टम
एक क्लिनिकल रिपोर्ट: हम देर होने तक क्यों टालते रहते हैं
भाग 2: अचानक खामोशी
अध्याय 6: अनुपस्थिति की जीवविज्ञान
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English हिन्दी
कबीर लिविंग रूम में पहुँचा। खामोशी उसे “आवाज़ के न होने” की तरह नहीं लगी—वह दबाव जैसी थी, हिंसक, कानों में बजती हुई। उसकी नज़र साइड टेबल पर गई। स्टील की प्लेट अब भी वहीं थी। पपीते के टुकड़े पारदर्शी, चिपचिपे नारंगी हो चुके थे। काँटा उसी कोण पर पड़ा था, जैसा पिता छोड़ गए थे। बारह घंटे पहले यही प्लेट झुंझलाहट थी—एक “ज़रूरी” मीटिंग में बाधा। अब वह एक अवशेष थी। उन्होंने मेरे लिए काटा था। पका हुआ फल चुना था। बीज निकाले थे। वे इस कमरे में आए—बस यह उम्मीद लेकर कि मैं उनकी तरफ देखूँ। और मैंने उन्हें मक्खी की तरह हटा दिया। मौत स्मृति को रियल-टाइम में री-राइट करती है। “झुंझलाने वाला बूढ़ा” घुलने लगा। उसकी जगह “संत” खड़ा हो गया। कबीर को याद आया—पिता देर रात तक जागते थे, कपड़े तह करते थे, जबकि घर में मेड थी। मैंने तब क्यों नहीं देखा? जब विषय चला जाता है, तभी लेंस क्यों साफ़ होता है? कबीर पिता के कमरे के दरवाज़े तक गया। वह थोड़ा सा खुला था। उसने धीरे से धकेलकर खोल दिया।
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