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अनकहे प्रेम का पोस्टमार्टम
एक क्लिनिकल रिपोर्ट: हम देर होने तक क्यों टालते रहते हैं
भाग 2: अचानक खामोशी
अध्याय 6: अनुपस्थिति की जीवविज्ञान
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उसने खिड़की के पास खाली कुर्सी देखी—जहाँ पिता ट्रैफिक देखते हुए बैठते थे। वे पुराने किशोर कुमार के गाने बेसुरे-से गुनगुनाते थे। Hmm-hmm-hmmm… कबीर को वह गुनगुनाहट चिढ़ाती थी। “पापा, प्लीज़, मैं काम कर रहा हूँ।” अब कबीर ने आँखें भींच लीं—अपने auditory cortex से विनती करते हुए कि वह उस आवाज़ का भ्रम ही पैदा कर दे। प्लीज़ गुनगुनाइए। मैं नहीं रोकूँगा। मैं सुनूँगा। मैं आपके साथ गाऊँगा। बस एक नोट। पर खामोशी टिकी रही। महँगी noise-canceling खिड़कियाँ अपना काम बहुत अच्छी तरह कर रही थीं। कबीर पिता के बिस्तर पर सिकुड़ गया—सूट पहने, जूते सहित, जूते सफ़ेद चादर में चुभ रहे थे। CEO, hustler, “main character”—सब घुल गया। बचा सिर्फ़ एक डरा हुआ बच्चा—ऐसी चीज़ों के बीच जो अब अर्थहीन हो चुकी थीं। उसे तब समझ आया: शोक सिर्फ़ भावना नहीं है। वह जीवविज्ञान है। वह शरीर है—जो उस दुनिया में चलने की कोशिश कर रहा है जहाँ अब ऑक्सीजन नहीं बची।
समाप्ति (वैकल्पिक)
आप चाहें तो इस अध्याय को “Completed” मार्क कर सकते हैं। यह वैकल्पिक है।
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