“पूरी ज़िंदगी ऐसे ही निकल गई,” फ़राह ने सोचा—बेहतर संस्करण का इंतज़ार करते हुए, वर्तमान को नज़रअंदाज़ करते हुए।
फिर वह मंगलवार आया।
एक आम मंगलवार। फ़राह चिल्लाईं क्योंकि बिजली का बिल समय पर नहीं भरा गया था।
“तुम कितने गैर-जिम्मेदार हो, रोहन!” वे चीखीं, घड़ी देखते हुए। “तुम बड़े कब होगे?”
रोहन मुस्कुराया—उदास, धैर्यभरी मुस्कान। “सॉरी, फ़रा। मैं बारिश देख रहा था। बहुत सुंदर थी।”
“बारिश लाइट नहीं जलाएगी,” फ़राह ने तिक्तता से कहा। उन्होंने चाबियाँ उठाईं और दरवाज़ा पटकते हुए निकल गईं।
उन्होंने उसे विदा-चुंबन नहीं दिया।
यह उनकी सज़ा थी।
दो घंटे बाद, रोहन का दिल रुक गया।
मासिव कार्डियक अरेस्ट।
वह किचन फ़्लोर पर गिरा—उस दाल की गंध के बीच जो वह उनके लिए बना रहा था।
कवियों का “अचानक” अतिशयोक्ति नहीं है। वह एक गिलोटीन है।
जब फ़राह घर लौटीं, लाइटें जल रही थीं।
बिल भर दिया गया था।
दाल जल चुकी थी।
और रोहन जा चुका था।
आने वाले हफ्तों में if-then लॉजिक ढह गया।
उन्हें वही चीज़ें याद आने लगीं जिन पर वे तंज कसती थीं।
उसकी धीमी चाल।
बालकनी का “समय बर्बाद।”
उसकी गुनगुनाहट।
उन्हें समझ आया—जिसे वे “अम्बिशन की कमी” कहती थीं, उसका दूसरा नाम था:
Contentment (संतोष)।