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अनकहे प्रेम का पोस्टमार्टम
एक क्लिनिकल रिपोर्ट: हम देर होने तक क्यों टालते रहते हैं
भाग 3: "बहुत देर" की शारीरिक रचना
अध्याय 9: पछतावे का संक्रमण
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THE AUTOPSY OF UNSPENT LOVE भाग 3: “बहुत देर” की शारीरिक रचना अध्याय 9: पछतावे का संक्रमण हेलिक्स डायग्नोस्टिक्स का वेटिंग रूम आमतौर पर खामोश, प्रतिस्पर्धी पीड़ा का अखाड़ा होता था। यहाँ लोग अपनी आँखें फोन में गाड़कर बैठते—जैसे बीमारी की सच्चाई से बचने के लिए उन्होंने अपने चारों ओर अदृश्य दीवारें खड़ी कर ली हों। लेकिन आज, वे दीवारें गिर रही थीं। कबीर कमरे के बीचों-बीच बैठा था। वह जोर से नहीं रो रहा था—वह आसान होता; लोग उसे “डिस्टर्बेंस” समझकर अलग कर देते। वह तो बस… रिस रहा था। बिना आवाज़ के आँसू उसके चेहरे से बह रहे थे, और उसकी महंगी शर्ट के कॉलर में समा रहे थे। उसकी निगाहें फोन की स्क्रीन पर जमी थीं—एक PDF। उसके पिता की अंतिम मेडिकल रिपोर्ट। मृत्यु का कारण: तीव्र हृदयाघात। मृत्यु का समय: 11:42 PM. “मैं कॉल पर था,” कबीर ने कहा। किसी को संबोधित नहीं किया—फिर भी कमरे की चुप्पी इतनी भारी थी कि उसकी फुसफुसाहट भी चीख जैसी लग रही थी। “वो 11:42 पर चले गए। मैं 11:45 पर अपना पिच खत्म करके निकला। मैं… जश्न मना रहा था… जब वो ठंडे पड़ रहे थे।” तीन सीट दूर बैठी मीरा ने लैपटॉप से नजर उठाई। वह व्यवधानों से नफरत करती थी। उसे वे “efficiency leaks” लगते थे—उत्पादकता में रिसाव। पर कबीर की आवाज़ में कुछ था— टूटे हुए कांच जैसा, कच्चा, जख्मी— जिसने उसे स्क्रीन बंद करने पर मजबूर कर दिया। “मुझे उसका गुनगुनाना नफरत था,” कबीर बोलता गया, उसकी आवाज़ काँप रही थी। “वो पौधों को पानी देते समय गुनगुनाता था। मुझे पागल कर देता था। पिछले हफ्ते मैंने उसे कहा था—चुप हो जाओ।” उसने सिर उठाया। आँखें लाल, जंगली, जैसे वे किसी सजा की तलाश में हों। उसने कमरे में बैठे अजनबियों को ऐसे देखा, जैसे वे गवाह हों। “मैं अपनी पूरी कंपनी दे दूँ… मेरे पास जितना पैसा है, सब दे दूँ… बस एक बार… बस एक बार वो बेसुरा, परेशान करने वाला गुनगुनाना फिर से सुनने के लिए।” कमरे की हवा बदल गई। यह अब सिर्फ कबीर का दर्द नहीं था। यह हवा में फैलने वाला रोगाणु बन गया। यह था—बोध का वायरस। पछतावे का संक्रमण। मीरा के भीतर कुछ ठंडा उतर गया। “परेशान करने वाली” चीज़ें… उसने अपनी माँ को सोचा। सुपारी चबाने की तेज़ आवाज़—चपचप। दिन में पाँच बार फोन—“खाया?” और उसने सोचा—कैसे उसने ऑफिस के समय में माँ का नंबर सेव कर रखा था: “Do Not Pick Up”. अचानक मीरा अपनी माँ को चिढ़ की नज़र से नहीं देख रही थी। वह उन्हें अंतिमता की नज़र से देख रही थी— जैसे कोई चीज़ अब “वापस नहीं आने वाली” हो जाती है। उसने कल्पना की— घर जिसमें सुपारी की गंध नहीं होगी। फोन जो अब कभी नहीं बजेगा। वह खामोशी, जिसमें कबीर इस समय डूब रहा था। “मेरी माँ अगली है,” यह विचार उसे ऐसे लगा जैसे किसी ने सीने पर मुक्का मारा हो। “सब कितनी जल्दी हो जाता है,” कबीर बुदबुदाया, सिर दोनों हाथों में। “तुम सोचते हो समय है। सोचते हो—‘प्रमोशन मिलते ही मैं अच्छा बन जाऊँगा।’ ‘कम तनाव होगा तो धैर्य रखूँगा।’ पर डेडलाइन तुम्हारे कैलेंडर पर नहीं होती… वो भगवान के कैलेंडर पर होती है।” कमरे के दूसरे कोने में, आरव—युवा टेक-लड़का—ने फोन नीचे किया। वह बम्बल पर स्वाइप कर रहा था। उसने कबीर को देखा, फिर अपने पास की खाली कुर्सी को। उसने अपनी एक्स को सोचा—जिससे उसने ब्रेकअप कर लिया था, क्योंकि वह “काफी ambitious नहीं थी।” उसे पहली बार समझ आया— उसने एक इंसान को एक चेकलिस्ट के बदले बदल दिया था। संक्रमण फैल रहा था। यह शरीर का रोग नहीं था। यह घबराहट के भेस में एक आध्यात्मिक जागृति थी। मीरा खड़ी हुई। पैर डगमगा रहे थे। “सुपरवुमन” का मुखौटा दरक गया था। वह कबीर की ओर चली। वह उसे नहीं जानती थी— पर शोक एक सार्वभौमिक भाषा है, जो शिष्टाचार के नियमों को पार कर जाती है। “मैंने भी किया है,” मीरा ने धीमे से कहा। कबीर ने ऊपर देखा। “मेरी माँ,” मीरा का गला टूट गया। “वो हरिद्वार की यात्रा के बारे में बताना चाहती थीं। मैंने कहा—सीधे मुद्दे पर आओ। मैंने उनकी कहानी को एक ट्रांजैक्शन की तरह ट्रीट किया—जिसे जल्दी बंद करना है।” “उन्हें कॉल करो,” कबीर ने कहा। यह सलाह नहीं थी। यह आदेश था—हताश और तात्कालिक। “अभी कॉल करो। ‘सही समय’ का इंतज़ार मत करो। सही समय वही है… जब वो सांस ले रहे हों।” मीरा ने फोन निकाला। हाथ काँप रहे थे। स्क्रीन अनलॉक करना भी मुश्किल था। उसने “माँ” डायल किया। रिंग… रिंग… “हैलो?” माँ की आवाज़ हिचकिचाती थी— जैसे काम में बाधा डालने पर डाँट पड़ने वाली हो। “मीरा? सब ठीक है?” मीरा ने आँखें भींच लीं। आँसू गरम थे—और तेज़। उन्होंने ईमेल, डेडलाइन, शर्तें, अहंकार की परत— सब धो दिया। “माँ,” मीरा की आवाज़ टूट गई। “हरिद्वार के बारे में बताइए। नदी के बारे में बताइए। मैं सुनना चाहती हूँ… सब कुछ।” “अभी?” माँ ने हैरानी से पूछा। “पर तुम क्लिनिक में हो… तुम व्यस्त हो।” “मैं व्यस्त नहीं हूँ,” मीरा सिसक पड़ी, और कबीर के पास वाली कुर्सी पर बैठ गई। “मैं व्यस्त नहीं हूँ, माँ। मैं… सुन रही हूँ।” वेटिंग रूम की चुप्पी अब टोकन नंबरों से नहीं टूट रही थी। वह टूट रही थी— दीवारों के गिरने की आवाज़ से। अंदर की दीवारें। अहम की दीवारें। “बिज़ी” की दीवारें। कबीर मीरा को देखता रहा। और कई दिनों बाद पहली बार, उसके सीने पर रखा पत्थर एक मिलीमीटर सा हल्का हुआ। वह अपने पिता को नहीं बचा सका। पर उसने अभी… मीरा की माँ को बचा लिया था। संक्रमण फैल चुका था। पर इस बार यह मृत्यु का संक्रमण नहीं था। यह बिना शर्त प्रेम की शुरुआत थी— दर्दनाक, ज्वर-सी, पर असली। ________________________________________ (इस अध्याय के पीछे का तंत्र — संक्षेप में) 1) भावनात्मक संक्रामकता: एक व्यक्ति का शोक दूसरों में भी बोध जगा देता है—पछतावा “हवा में” फैलता है, और सबको अपनी-अपनी अधूरी इंसानियत दिखा देता है। 2) “हाय-अफसोस” क्षण चेतावनी बन जाता है: कबीर का दुख मीरा के लिए भविष्य की झलक बनता है—वह पछतावे को समय रहते महसूस कर लेती है, और अभी बदल सकती है। 3) “मैं बहुत व्यस्त हूँ” वाली स्क्रिप्ट का टूटना: मीरा पहली बार शेड्यूल को नहीं, इंसान को प्राथमिकता देती है—यही हीलिंग की शुरुआत है। 4) लेन-देन से रिश्ते की ओर बदलाव: मीरा अब कॉल को “काम” नहीं मानती। वह उसे प्रेम का कर्म बना देती है— “मैं सुनना चाहती हूँ। पूरा।”
समाप्ति (वैकल्पिक)
आप चाहें तो इस अध्याय को “Completed” मार्क कर सकते हैं। यह वैकल्पिक है।
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